शनिवार बदलेगा स्कूलों का चेहरा, लेकिन असली सवाल टाइमिंग नहीं—क्या टिकेगी नई व्यवस्था?

शनिवार बदलेगा स्कूलों का चेहरा, लेकिन असली सवाल टाइमिंग नहीं—क्या टिकेगी नई व्यवस्था?

छत्तीसगढ़ में शनिवार को डे-शिफ्ट, बैगलेस डे, खेल-संस्कृति और छात्राओं के कराटे प्रशिक्षण की तैयारी के बीच नीति के क्रियान्वयन, संसाधन और परिणामों को लेकर उठे अहम सवाल

रायपुर। छत्तीसगढ़ की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में शनिवार को लेकर प्रस्तावित बदलाव ने शिक्षा के उद्देश्य, गुणवत्ता और सरकारी योजनाओं की निरंतरता पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत शनिवार को मॉर्निंग शिफ्ट में संचालित होने वाले स्कूलों को डे-शिफ्ट में लाने की तैयारी है। इस दिन नियमित पढ़ाई के साथ खेल, सांस्कृतिक गतिविधियां, स्थानीय खेल, योग और अन्य रचनात्मक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है। छात्राओं को आत्मरक्षा के लिए कराटे प्रशिक्षण देने तथा इसके लिए मास्टर ट्रेनर तैयार करने की योजना भी चर्चा में है।

पहली नजर में देखें तो यह पहल विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास की दिशा में एक सकारात्मक कदम दिखाई देती है। शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तक, होमवर्क और परीक्षा तक सीमित रखने के बजाय खेल, कला, संस्कृति, कौशल और अनुभवात्मक गतिविधियों से जोड़ने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जाती रही है।

लेकिन प्रस्तावित बदलाव के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—क्या यह व्यवस्था सिर्फ नई घोषणा बनकर रह जाएगी या अगले कई वर्षों तक लगातार और प्रभावी ढंग से जमीन पर लागू होती रहेगी?

टाइमिंग से बड़ा मुद्दा है नीति की निरंतरता

स्कूलों में समय-सारणी बदलना प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षाकृत आसान फैसला हो सकता है, लेकिन किसी भी शिक्षा सुधार का वास्तविक प्रभाव उसकी टाइमिंग से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन से निर्धारित होता है।

स्कूली शिक्षा में समय-समय पर नई योजनाएं लागू होती रही हैं। कभी स्मार्ट क्लास को प्राथमिकता मिली, कभी डिजिटल शिक्षा को, कभी योग और कौशल विकास को, तो कभी बैगलेस डे जैसी अवधारणाओं को आगे बढ़ाया गया।

इन योजनाओं में से किसी भी विचार को मूल रूप से गलत नहीं कहा जा सकता। समस्या अक्सर योजना के उद्देश्य में नहीं बल्कि उसकी निरंतरता, निगरानी, संसाधन और परिणामों के मूल्यांकन में सामने आती है।

किसी योजना के लागू होने के कुछ महीनों बाद यदि उसकी समीक्षा बंद हो जाए, प्रशिक्षण औपचारिकता बन जाए और गतिविधियों की रिपोर्ट ही सफलता का आधार बन जाए, तो ऐसी व्यवस्था का वास्तविक शैक्षणिक प्रभाव सीमित हो सकता है।

इसलिए शनिवार की नई व्यवस्था के साथ पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि स्कूल कितने बजे खुलेंगे?

बल्कि सवाल होना चाहिए—

इस व्यवस्था से बच्चों को क्या मिलेगा और पांच साल बाद इसका परिणाम कैसे मापा जाएगा?

बैगलेस डे की अवधारणा में संभावनाएं, लेकिन मॉडल जरूरी

बैगलेस डे का उद्देश्य विद्यार्थियों को कुछ समय के लिए किताबों और पारंपरिक कक्षा व्यवस्था से बाहर निकालकर वास्तविक जीवन से जुड़े अनुभव देना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी अनुभवात्मक, कौशल आधारित और समग्र शिक्षा पर जोर दिया गया है।

यदि छत्तीसगढ़ में प्रत्येक शनिवार को इस अवधारणा को प्रभावी रूप से लागू किया जाता है तो विद्यार्थियों को खेल, स्थानीय कला, संस्कृति, योग, रचनात्मक गतिविधियों और व्यावहारिक कौशल से जोड़ने का अवसर मिल सकता है।

लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—हर स्कूल के लिए गतिविधियों का व्यावहारिक मॉडल क्या होगा?

शहरी क्षेत्र के किसी बड़े स्कूल और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र के छोटे स्कूल की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं।

किसी स्कूल में पर्याप्त खेल मैदान हो सकता है, जबकि किसी दूसरे स्कूल के पास सीमित स्थान हो। कहीं प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध होंगे तो कहीं अतिरिक्त प्रशिक्षण की जरूरत होगी। कुछ स्कूलों में खेल सामग्री पर्याप्त हो सकती है, जबकि कई जगह बुनियादी संसाधनों की कमी भी हो सकती है।

ऐसे में केवल यह आदेश जारी करना कि शनिवार को बैगलेस डे होगा, पर्याप्त नहीं होगा।

जरूरत इस बात की है कि विभाग कक्षा, स्कूल और क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार स्पष्ट गतिविधि मॉड्यूल तैयार करे।

कहीं बैगलेस डे सिर्फ ‘बैग नहीं लाने’ का दिन न बन जाए

इस व्यवस्था की सफलता इस बात से तय नहीं होगी कि शनिवार को बच्चों ने स्कूल में बैग लेकर प्रवेश किया या नहीं।

सफलता तब होगी जब बच्चे उस दिन कुछ नया सीखकर घर लौटें।

यदि खेल गतिविधि है तो उसमें बच्चों की भागीदारी हो। यदि स्थानीय कला सिखाई जा रही है तो स्थानीय कलाकार या प्रशिक्षित शिक्षक उससे जुड़े हों। यदि योग कराया जा रहा है तो उसका नियमित अभ्यास हो। यदि आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया जा रहा है तो प्रशिक्षण की गुणवत्ता और निरंतरता सुनिश्चित की जाए।

अन्यथा आशंका यही रहेगी कि गतिविधियों की जगह कागजी रिकॉर्ड तैयार हो जाएं और बैगलेस डे केवल ‘बैग नहीं लाना है’ वाले शनिवार तक सीमित होकर रह जाए।

छात्राओं के कराटे प्रशिक्षण पर भी निगरानी जरूरी

छात्राओं को कराटे और आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देने की पहल निश्चित रूप से उपयोगी हो सकती है। आत्मरक्षा कौशल विद्यार्थियों में शारीरिक क्षमता के साथ आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता को भी मजबूत कर सकता है।

लेकिन यहां भी केवल मास्टर ट्रेनर तैयार कर देना पर्याप्त नहीं होगा।

यह स्पष्ट होना चाहिए कि—

  • मास्टर ट्रेनर कितने स्कूलों को प्रशिक्षण देंगे?
  • प्रत्येक स्कूल में प्रशिक्षण कितने समय तक चलेगा?
  • प्रशिक्षक की योग्यता और प्रमाणन क्या होगा?
  • छात्राओं की नियमित भागीदारी कैसे दर्ज होगी?
  • प्रशिक्षण पूरा करने के बाद दक्षता का मूल्यांकन कैसे होगा?
  • ग्रामीण और दूरस्थ स्कूलों तक प्रशिक्षक कैसे पहुंचेंगे?
  • क्या प्रशिक्षण एक अभियान रहेगा या नियमित स्कूल गतिविधि बनेगा?

यदि इन सवालों का जवाब व्यवस्था में शामिल किया जाता है, तभी कराटे प्रशिक्षण को एक टिकाऊ शिक्षा पहल में बदला जा सकता है।

दूसरे राज्यों के अनुभव से मिल सकता है रास्ता

देश के विभिन्न राज्यों में शिक्षा सुधारों के दौरान उपस्थिति, बुनियादी शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और निगरानी को मजबूत करने के अलग-अलग प्रयास हुए हैं।

पंजाब में सरकारी स्कूलों में रियल-टाइम ऑनलाइन उपस्थिति जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से विद्यार्थियों की उपस्थिति और अभिभावकों तक सूचना पहुंचाने पर जोर दिया गया है।

उत्तर प्रदेश में NIPUN Bharat और NIPUN 2.0 के अंतर्गत बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान के साथ शिक्षक प्रशिक्षण, मास्टर ट्रेनर, मूल्यांकन और मॉनिटरिंग को जोड़ा गया है।

इन उदाहरणों से एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सबक सामने आता है—

योजना अकेली पर्याप्त नहीं है। योजना के साथ प्रशिक्षण, निगरानी, मूल्यांकन और जवाबदेही जरूरी है।

छत्तीसगढ़ भी शनिवार की नई व्यवस्था को इसी तरह एक मापने योग्य शिक्षा सुधार कार्यक्रम के रूप में विकसित कर सकता है।

स्कूलों में गतिविधियां हों तो उनका डेटा भी होना चाहिए

मान लीजिए शनिवार को प्रदेश के हजारों स्कूलों में खेल गतिविधियां शुरू होती हैं।

तो केवल यह रिपोर्ट तैयार करना पर्याप्त नहीं होना चाहिए कि कितने स्कूलों में खेल आयोजित हुआ।

विभाग को इससे आगे जाकर यह जानना चाहिए—

कितने बच्चों ने हिस्सा लिया?

कितने बच्चों की खेल प्रतिभा सामने आई?

कितने स्कूलों में प्रशिक्षित प्रशिक्षक उपलब्ध हैं?

कितने स्कूलों में खेल सामग्री पर्याप्त है?

छात्राओं में से कितनों ने कराटे प्रशिक्षण पूरा किया?

कितने विद्यार्थियों की उपस्थिति में सुधार हुआ?

अभिभावकों और विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया क्या रही?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या इन गतिविधियों का विद्यार्थियों के learning outcomes, आत्मविश्वास, उपस्थिति और सामाजिक कौशल पर कोई मापने योग्य प्रभाव पड़ा?

यदि विभाग इन आंकड़ों को छह महीने या एक वर्ष के अंतराल पर सार्वजनिक करता है तो जनता भी यह देख सकेगी कि योजना केवल लागू हुई है या वास्तव में काम कर रही है।

सरकारी खर्च से ज्यादा जरूरी है खर्च का परिणाम

शिक्षा पर सरकार द्वारा खर्च किया जाना आवश्यक है। स्कूलों में खेल सामग्री, प्रशिक्षण, डिजिटल उपकरण, अधोसंरचना और अन्य संसाधनों के लिए सार्वजनिक धन का इस्तेमाल होना स्वाभाविक है।

लेकिन सार्वजनिक धन के साथ सार्वजनिक जवाबदेही भी जुड़ी होती है।

सवाल यह नहीं है कि सरकार ने पैसा क्यों खर्च किया।

सवाल यह है कि पैसे के बदले बच्चों को क्या मिला?

खेल सामग्री खरीदी गई तो उसका इस्तेमाल कितना हुआ?

स्मार्ट क्लास बनाई गई तो उसका शैक्षणिक उपयोग कितना हुआ?

शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया गया तो प्रशिक्षण के बाद कक्षा में क्या बदलाव आया?

मास्टर ट्रेनर तैयार किए गए तो उन्होंने कितने शिक्षकों को आगे प्रशिक्षित किया?

किसी गतिविधि के लिए बजट मिला तो वह गतिविधि अगले साल भी उसी गुणवत्ता के साथ जारी रही या नहीं?

यही सवाल सरकारी योजनाओं की वास्तविक उपयोगिता निर्धारित करते हैं।

हर नई सरकार के साथ नई प्राथमिकता या पहले मूल्यांकन?

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारों और मंत्रियों का अपनी प्राथमिकताएं तय करना स्वाभाविक है। लेकिन शिक्षा ऐसा क्षेत्र है जहां किसी भी नीति का पूरा परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देता।

एक शिक्षक का प्रशिक्षण, बच्चे की सीखने की क्षमता, स्कूल की कार्यसंस्कृति और विद्यार्थियों की आदतों में बदलाव के लिए निरंतर समय चाहिए।

इसलिए नई व्यवस्था के साथ एक महत्वपूर्ण सुझाव यह हो सकता है कि शिक्षा विभाग पॉलिसी ऑडिट की स्थायी व्यवस्था बनाए।

पिछले पांच से दस वर्षों में लागू प्रमुख शिक्षा योजनाओं की समीक्षा की जाए—

लक्ष्य क्या था?

बजट कितना था?

कितना खर्च हुआ?

कितने विद्यार्थियों तक लाभ पहुंचा?

क्या लक्ष्य हासिल हुआ?

कहां कमी रही?

कौन-सी व्यवस्था सफल रही?

क्या सफल मॉडल को नई नीति में शामिल किया गया?

ऐसा मूल्यांकन शिक्षा नीति को राजनीतिक या प्रशासनिक बदलावों से प्रभावित होने के बजाय संस्थागत निरंतरता दे सकता है।

शिक्षा सुधार में ‘निरंतरता’ सबसे बड़ा निवेश

किसी भी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में केवल बजट पर्याप्त नहीं होता।

इसके लिए नीति की स्थिरता भी जरूरी है।

यदि हर कुछ वर्षों में नई योजना आती है और पिछली योजना बिना पर्याप्त मूल्यांकन के समाप्त हो जाती है, तो शिक्षक और स्कूल प्रशासन लगातार नई व्यवस्थाओं के अनुरूप ढलने में ऊर्जा खर्च करते रहते हैं।

इसके विपरीत यदि सफल योजनाओं को पहचानकर उन्हें लंबे समय तक जारी रखा जाए, तो धीरे-धीरे स्कूलों में संस्थागत क्षमता विकसित होती है।

यही कारण है कि शनिवार की प्रस्तावित व्यवस्था को भी कम से कम एक निश्चित अवधि के लिए स्पष्ट लक्ष्य, बजट और मूल्यांकन प्रणाली के साथ लागू किया जाना चाहिए।

अभिभावकों की सुविधा भी नीति का हिस्सा

शनिवार को मॉर्निंग शिफ्ट से डे-शिफ्ट में बदलाव केवल स्कूल प्रशासन का विषय नहीं है।

इसका सीधा असर अभिभावकों की दिनचर्या पर भी पड़ेगा।

कामकाजी अभिभावकों के लिए बच्चों के स्कूल आने-जाने का समय महत्वपूर्ण है। ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन की उपलब्धता और दूरी अलग चुनौती हो सकती है। छोटे बच्चों के लिए भी अलग परिस्थितियां हो सकती हैं।

इसलिए किसी भी समय-सारणी को लागू करने से पहले स्थानीय स्तर पर अभिभावकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों से फीडबैक लेने की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।

अच्छी नीति वही है जो उद्देश्य के साथ व्यवहारिकता को भी ध्यान में रखे।

शिक्षक पर अतिरिक्त बोझ न पड़े

शनिवार को खेल, संस्कृति, योग, स्थानीय कला, कराटे और दूसरी गतिविधियां संचालित करने की योजना तभी सफल होगी जब शिक्षकों को पर्याप्त सहयोग और संसाधन मिलेंगे।

यदि प्रत्येक गतिविधि की जिम्मेदारी मौजूदा शिक्षकों पर डाल दी गई और उनसे पढ़ाई के साथ अतिरिक्त गतिविधियों की रिपोर्टिंग भी कराई गई, तो व्यवस्था का उद्देश्य उल्टा भी पड़ सकता है।

शिक्षक का समय कागजी रिपोर्ट तैयार करने में नहीं बल्कि विद्यार्थियों के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और गतिविधियों में लगना चाहिए।

शिक्षा की गुणवत्ता एक्सेल शीट या रिपोर्ट में नहीं, कक्षा और स्कूल के वातावरण में दिखाई देती है।

सफलता का पैमाना बदला जाना चाहिए

शनिवार की नई व्यवस्था की सफलता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि—

कितने स्कूलों ने आदेश लागू किया?

इसके बजाय पूछा जाना चाहिए—

कितने बच्चों ने भाग लिया?

कितने बच्चों की उपस्थिति सुधरी?

कितने विद्यार्थियों की खेल और रचनात्मक प्रतिभा पहचानी गई?

कितनी छात्राओं ने आत्मरक्षा का प्रशिक्षण पूरा किया?

क्या बच्चों में आत्मविश्वास और टीमवर्क बेहतर हुआ?

क्या learning outcomes में सुधार आया?

क्या दो वर्ष बाद भी गतिविधियां उसी गुणवत्ता के साथ चल रही हैं?

यही वास्तविक outcome-based monitoring होगी।

पांच साल की निरंतरता योजना क्यों जरूरी?

छत्तीसगढ़ में शनिवार की नई व्यवस्था लागू होती है तो उसके साथ पांच वर्षीय रोडमैप तैयार किया जा सकता है।

पहले वर्ष में बुनियादी ढांचा और प्रशिक्षण।

दूसरे वर्ष में गतिविधियों की गुणवत्ता और पहुंच का मूल्यांकन।

तीसरे वर्ष में सफल मॉडलों का विस्तार।

चौथे वर्ष में learning outcomes और विद्यार्थियों की भागीदारी का तुलनात्मक अध्ययन।

पांचवें वर्ष में स्वतंत्र मूल्यांकन और नीति के अगले चरण का निर्धारण।

इसके साथ यदि सार्वजनिक डैशबोर्ड पर स्कूलवार या जिलेवार प्रमुख संकेतक उपलब्ध हों, तो अभिभावक और नागरिक भी योजना की प्रगति देख सकेंगे।

बदलाव जरूरी है, लेकिन बदलाव की उम्र भी तय होनी चाहिए

छत्तीसगढ़ की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत को नकारा नहीं जा सकता।

लेकिन सुधार का अर्थ केवल नई घोषणा नहीं है।

सुधार का अर्थ है—एक बेहतर व्यवस्था तैयार करना, उसे पर्याप्त समय देना, उसके परिणामों को मापना, कमियों को दूर करना और सफल मॉडल को लगातार मजबूत करना।

सरकारें बदलेंगी। मंत्री बदलेंगे। अधिकारी बदलेंगे। प्रशासनिक प्राथमिकताएं बदल सकती हैं।

लेकिन विद्यार्थियों का भविष्य इन बदलावों से कहीं बड़ा है।

इसलिए शिक्षा नीति को व्यक्तियों और कार्यकालों से ऊपर उठाकर संस्थागत निरंतरता देने की जरूरत है।

निष्कर्ष: सवाल ‘नई नीति कब?’ नहीं, ‘नई नीति के बाद क्या?’ है

शनिवार को डे-शिफ्ट, बैगलेस डे, खेल, संस्कृति, योग और छात्राओं के कराटे प्रशिक्षण जैसी पहलें उद्देश्य की दृष्टि से उपयोगी हो सकती हैं। इन्हें केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि पहले भी कई योजनाएं आईं और उनका प्रभाव अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा।

लेकिन पिछली योजनाओं के अनुभव से सीखना उतना ही जरूरी है।

छत्तीसगढ़ के सामने असली चुनौती नई घोषणा करने की नहीं, बल्कि नई व्यवस्था को टिकाऊ बनाने की है।

सरकार के सामने सवाल है कि योजना कितनी प्रभावी होगी।

विभाग के सामने सवाल है कि उसकी निगरानी कैसे होगी।

शिक्षकों के सामने सवाल है कि उन्हें पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण कैसे मिलेगा।

और अभिभावकों के सामने सवाल है कि उनके बच्चों को इसका वास्तविक लाभ कितना मिलेगा।

इसलिए शनिवार की नई व्यवस्था पर बहस केवल स्कूल की टाइमिंग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

असली सवाल यह है—नई नीति पांच साल बाद भी कितनी प्रभावी रहेगी?

क्योंकि स्कूलों में बदलाव एक दिन में नहीं आता।

बदलाव तब आता है, जब नीति बनाने वाले चेहरे बदल जाएं, सरकारें बदल जाएं और अधिकारी बदल जाएं—लेकिन जो व्यवस्था बच्चों के हित में सफल साबित हो, वह निरंतर चलती रहे।

Drishtibharatnews24 के लिए मूल सवाल यही है: शनिवार बदलेगा, लेकिन क्या इस बदलाव की दिशा और नीति की निरंतरता भी बनी रहेगी?

दृष्टि भारत न्यूज़ 24 - अस्वीकरण

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