छत्तीसगढ़ में शनिवार को डे-शिफ्ट, बैगलेस डे, खेल-संस्कृति और छात्राओं के कराटे प्रशिक्षण की तैयारी के बीच बड़ा सवाल—नई व्यवस्था का परिणाम क्या होगा?
रायपुर। छत्तीसगढ़ के स्कूलों में शनिवार की व्यवस्था बदलने की तैयारी ने एक बार फिर स्कूली शिक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस खड़ी कर दी है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार शनिवार को मॉर्निंग शिफ्ट में संचालित होने वाले स्कूलों को डे-शिफ्ट में लाया जाएगा। इस दिन पढ़ाई के साथ खेल, सांस्कृतिक गतिविधियां, स्थानीय खेल, योग और अन्य रचनात्मक गतिविधियों पर जोर देने की बात कही गई है। छात्राओं को आत्मरक्षा के लिए कराटे प्रशिक्षण देने और इसके लिए मास्टर ट्रेनर तैयार करने की योजना भी सामने आई है।
पहली नजर में यह पहल विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास की दिशा में सकारात्मक दिखाई देती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तक और परीक्षा तक सीमित रखने के बजाय अनुभवात्मक, कौशल आधारित और समग्र बनाने की बात करती है। बैगलेस डे की अवधारणा भी इसी सोच का हिस्सा है।

लेकिन यहीं से एक दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण सवाल जन्म लेता है—
क्या नई नीति वास्तव में पुरानी व्यवस्था में सार्थक सुधार करेगी, या कुछ समय बाद यह भी दूसरी योजनाओं की तरह फाइलों, प्रशिक्षणों, बैठकों और रिपोर्टों तक सीमित होकर रह जाएगी?
नीति बदलना आसान, नीति को टिकाना कठिन
स्कूली शिक्षा में समय-समय पर सरकारें नई योजनाएं और नई कार्यप्रणालियां लेकर आती रही हैं। किसी दौर में स्कूलों की टाइमिंग महत्वपूर्ण मुद्दा बनती है, किसी दौर में स्मार्ट क्लास, किसी दौर में डिजिटल शिक्षा, कहीं योग, कहीं कौशल विकास, कहीं बैगलेस डे और कहीं अलग-अलग प्रकार के प्रशिक्षण।
इनमें से अधिकांश विचार अपने उद्देश्य की दृष्टि से गलत नहीं होते। समस्या अक्सर नीति की अवधारणा में नहीं, उसके निरंतर और समान रूप से क्रियान्वयन में होती है।
नई सरकार या नया मंत्री आते ही यदि पिछली व्यवस्था का मूल्यांकन किए बिना नई प्राथमिकता निर्धारित कर दी जाए, तो स्कूलों में लगातार प्रयोग तो होते रहते हैं, लेकिन यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में किस योजना से विद्यार्थियों को कितना लाभ हुआ।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि नई नीति क्यों लाई जा रही है?
सवाल यह होना चाहिए कि—
पिछली नीति का परिणाम क्या रहा?
कितना पैसा खर्च हुआ?
कितने विद्यार्थियों को वास्तविक लाभ मिला?
कितने स्कूलों में योजना नियमित रूप से चली?
और अगर योजना सफल थी तो उसे आगे क्यों नहीं बढ़ाया गया?
शनिवार का बैगलेस डे—अवधारणा अच्छी, लेकिन मॉडल स्पष्ट होना जरूरी
बैगलेस डे कोई पूरी तरह नई अवधारणा नहीं है। NEP 2020 में कक्षा 6 से 8 के विद्यार्थियों के लिए 10 बैगलेस दिनों और अनुभवात्मक गतिविधियों की सिफारिश की गई थी। इसमें स्थानीय व्यावसायिक विशेषज्ञों से सीखने तथा कला, खेल और व्यावसायिक गतिविधियों को शिक्षा से जोड़ने की बात कही गई है।
छत्तीसगढ़ में यदि प्रत्येक शनिवार को इसे अधिक व्यापक रूप दिया जाता है, तो यह निश्चित रूप से बच्चों को किताबों की दुनिया से बाहर वास्तविक जीवन के अनुभवों से जोड़ सकता है।
लेकिन इसके लिए केवल आदेश पर्याप्त नहीं होगा।
यदि किसी स्कूल में खेल का मैदान नहीं है, खेल सामग्री सीमित है, प्रशिक्षित शिक्षक नहीं हैं और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, तो बैगलेस डे कहीं केवल ‘बैग नहीं लाना है’ वाले शनिवार में बदल सकता है।
यही वह बिंदु है जहां नीति और उसके क्रियान्वयन का अंतर सामने आता है।
दूसरे राज्यों से क्या सीख मिलती है?
देश के कुछ राज्यों ने शिक्षा सुधार में केवल घोषणा के बजाय मॉनिटरिंग और परिणाम मापने पर अधिक जोर देने की कोशिश की है।
उदाहरण के लिए पंजाब में सरकारी स्कूलों में रियल-टाइम ऑनलाइन उपस्थिति प्रणाली शुरू की गई है, जिसमें अभिभावकों को बच्चों की अनुपस्थिति की जानकारी भेजने और लंबे समय तक अनुपस्थित रहने पर आगे की कार्रवाई की व्यवस्था की गई है। इस मॉडल का उद्देश्य उपस्थिति को केवल रजिस्टर का आंकड़ा न रखकर सीखने की निरंतरता से जोड़ना है।
उत्तर प्रदेश में NIPUN Bharat और NIPUN 2.0 के अंतर्गत बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर जोर देते हुए शिक्षक प्रशिक्षण, मास्टर ट्रेनर, नियमित मूल्यांकन और चरणबद्ध मॉनिटरिंग को जोड़ा गया है। यहां भी केवल योजना घोषित करने के बजाय प्रशिक्षण और परिणामों को एक निरंतर प्रक्रिया के रूप में देखने का प्रयास किया गया है।
यानी देश में शिक्षा सुधार के दो महत्वपूर्ण सबक दिखाई देते हैं—
योजना + प्रशिक्षण + निगरानी + मापने योग्य परिणाम = टिकाऊ सुधार।
सिर्फ योजना + आदेश = सीमित प्रभाव का खतरा।
छत्तीसगढ़ के सामने सबसे बड़ा अवसर
छत्तीसगढ़ की नई व्यवस्था में भी यही मॉडल अपनाया जा सकता है।
मान लीजिए शनिवार को हर स्कूल में खेल गतिविधियां शुरू होती हैं। तब विभाग को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि कितने स्कूलों में शनिवार को खेल हुआ।
यह देखना चाहिए कि—
- कितने बच्चों ने भाग लिया?
- कितने बच्चों की खेल प्रतिभा सामने आई?
- कितने स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध हैं?
- कितने स्कूलों में खेल सामग्री पर्याप्त है?
- छात्राओं को कराटे प्रशिक्षण कितने दिनों तक मिला?
- कितनी छात्राओं ने प्रशिक्षण पूरा किया?
- प्रशिक्षण के बाद उनकी दक्षता का मूल्यांकन कैसे हुआ?
- अभिभावकों और विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया क्या रही?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर हर छह महीने या हर वर्ष सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हों, तभी नीति की वास्तविक सफलता मापी जा सकती है।
असली चिंता सरकारी खर्च की नहीं, खर्च के परिणाम की है
शिक्षा पर सरकार जो पैसा खर्च करती है, वह जनता के करों से आता है। इसलिए किसी भी नई योजना पर खर्च होना अपने आप में गलत नहीं है।
गलत तब होगा जब खर्च का परिणाम मापने की व्यवस्था ही न हो।
खेल सामग्री खरीदी गई—क्या उसका उपयोग हो रहा है?
स्मार्ट क्लास बनाई गई—क्या बच्चे उससे पढ़ रहे हैं?
शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया गया—क्या प्रशिक्षण के बाद कक्षा में बदलाव आया?
मास्टर ट्रेनर बनाए गए—क्या वे नियमित रूप से दूसरे शिक्षकों को प्रशिक्षित कर रहे हैं?
नई गतिविधि शुरू हुई—क्या दो साल बाद भी वह चल रही है?
यही वे प्रश्न हैं जिनसे सरकारी खर्च की वास्तविक उपयोगिता सामने आती है।
शिक्षा क्षेत्र में किए गए अध्ययनों में भी यह संकेत मिलता है कि केवल सार्वजनिक खर्च बढ़ जाना अपने आप बेहतर learning outcomes की गारंटी नहीं देता। खर्च के साथ उसके उपयोग और परिणाम की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है।
इसलिए इसे सरकार पर आरोप के रूप में नहीं बल्कि सार्वजनिक धन की जवाबदेही के स्वाभाविक प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए।
हर नए मंत्री के साथ नई नीति या पुरानी नीति का मूल्यांकन?
लोकतंत्र में नई सरकार और नया मंत्री नई प्राथमिकताएं तय करें, यह स्वाभाविक है।
लेकिन शिक्षा जैसे क्षेत्र में परिणाम तत्काल नहीं आते। एक बच्चे के सीखने, शिक्षक के प्रशिक्षण और स्कूल की संस्कृति में बदलाव के लिए कई वर्षों की निरंतरता चाहिए।
यही कारण है कि नई व्यवस्था लागू करने से पहले विभाग को एक ‘पॉलिसी ऑडिट’ करना चाहिए।
पिछले पांच-दस वर्षों में लागू प्रमुख शिक्षा योजनाओं की समीक्षा हो—
क्या लक्ष्य था?
कितना बजट था?
कितना खर्च हुआ?
क्या लक्ष्य पूरा हुआ?
कहां असफलता रही?
कौन-सी व्यवस्था सफल रही?
और क्या उसे नई नीति में शामिल किया जा रहा है?
यदि ऐसा किया जाए तो हर नया मंत्री शिक्षा विभाग में आते ही पूरी व्यवस्था को नए सिरे से बदलने के बजाय पहले से सफल मॉडल को आगे बढ़ा सकता है।
दुनिया के सफल शिक्षा मॉडलों से एक बड़ा सबक
दुनिया के बेहतर प्रदर्शन करने वाले शिक्षा तंत्रों पर नजर डालें तो एक बात बार-बार सामने आती है—शिक्षा सुधार को केवल घोषणा नहीं, निरंतरता और गुणवत्ता नियंत्रण की आवश्यकता होती है।
भारत में भी NITI Aayog की हालिया स्कूल शिक्षा संबंधी रिपोर्ट ने स्कूल गुणवत्ता के लिए निरंतर, पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ गुणवत्ता आकलन तथा राज्य स्तर पर गुणवत्ता आश्वासन व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया है।
यानी अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय अनुभवों का मूल संदेश लगभग एक ही है—
नीति बदलने से ज्यादा महत्वपूर्ण है नीति को जमीन पर टिकाए रखना।
अभिभावकों की परेशानी भी नीति का हिस्सा होनी चाहिए
शनिवार को मॉर्निंग शिफ्ट से डे-शिफ्ट में बदलाव का असर केवल स्कूल पर नहीं पड़ेगा।
कामकाजी अभिभावकों की दिनचर्या बदलेगी।
बच्चों के आने-जाने का समय बदलेगा।
परिवहन की व्यवस्था प्रभावित होगी।
छोटे बच्चों और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए अलग परिस्थितियां हो सकती हैं।
इसलिए किसी भी नई समय-सारणी से पहले अभिभावकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों की वास्तविक परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है।
एक नीति जो कागज पर बहुत अच्छी दिखाई देती है, वह जमीन पर तभी सफल होगी जब उससे प्रभावित होने वाले लोगों के लिए वह व्यवहारिक भी हो।
शिक्षक पर अतिरिक्त जिम्मेदारी तो नहीं?
बैगलेस डे का उद्देश्य शिक्षक पर अतिरिक्त बोझ डालना नहीं बल्कि सीखने को अधिक रोचक बनाना है।
लेकिन यदि शनिवार को खेल, संस्कृति, योग, कराटे, स्थानीय कला, प्रतियोगिता और अन्य गतिविधियां संचालित करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित मानव संसाधन नहीं है, तो इसका पूरा भार अंततः मौजूदा शिक्षकों पर आ सकता है।
ऐसी स्थिति में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि शिक्षक केवल कागजी रिपोर्ट तैयार करने में व्यस्त न हो जाएं।
क्योंकि शिक्षा की गुणवत्ता रिपोर्ट में नहीं, कक्षा में दिखाई देती है।
नीति की सफलता का पैमाना क्या होना चाहिए?
छत्तीसगढ़ में शनिवार की नई व्यवस्था लागू होती है तो इसकी सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि—
‘कितने स्कूलों में आदेश लागू हुआ?’
बल्कि यह होना चाहिए कि—
‘कितने बच्चों के सीखने, खेलने, आत्मविश्वास, अनुशासन और प्रतिभा में वास्तविक सुधार आया?’
अगर दो वर्ष बाद विभाग यह दिखा सके कि विद्यार्थियों की खेल प्रतिभा बढ़ी, छात्राओं में आत्मरक्षा की क्षमता विकसित हुई, स्कूलों में उपस्थिति सुधरी, बच्चों का तनाव कम हुआ और learning outcomes बेहतर हुए—तो यह नीति सफल मानी जाएगी।
लेकिन यदि कुछ महीनों बाद गतिविधियां केवल रजिस्टर में दिखाई दें, प्रशिक्षण केवल प्रमाणपत्र तक सीमित रह जाएं और खरीदी गई सामग्री स्कूलों में अनुपयोगी पड़ी रहे, तो सवाल उठना स्वाभाविक होगा कि नीति का वास्तविक लाभ किसे मिला।
बदलाव जरूरी है, लेकिन बदलाव की उम्र भी तय होनी चाहिए
छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता से शायद ही कोई असहमति होगी।
लेकिन सुधार का अर्थ हर कुछ वर्षों में नई घोषणा करना नहीं है।
सुधार का अर्थ है—एक अच्छी नीति चुनना, उसे पर्याप्त समय देना, उसके परिणाम मापना, कमियां सुधारना और सफल मॉडल को लगातार आगे बढ़ाना।
शिक्षा मंत्री बदल सकते हैं। सरकारें बदल सकती हैं। अधिकारियों के तबादले हो सकते हैं। लेकिन बच्चे वही रहते हैं और उनका भविष्य पांच साल की प्रशासनिक अवधि से कहीं बड़ा होता है।
इसलिए किसी भी नई शिक्षा नीति के साथ एक पांच वर्षीय निरंतरता योजना, वार्षिक स्वतंत्र मूल्यांकन, सार्वजनिक डैशबोर्ड और खर्च बनाम परिणाम की रिपोर्ट अनिवार्य होनी चाहिए।
निष्कर्ष: सवाल नई नीति का नहीं, ‘नई नीति के बाद क्या?’ का है
शनिवार को डे-शिफ्ट, बैगलेस डे, खेल, संस्कृति और छात्राओं के कराटे प्रशिक्षण जैसी पहलें उद्देश्य की दृष्टि से उपयोगी हो सकती हैं। इन्हें केवल इसलिए खारिज करना उचित नहीं होगा कि पहले भी कई योजनाएं आईं और चली गईं।
लेकिन पिछली योजनाओं के अनुभव से सीखना भी उतना ही जरूरी है।
सरकार के सामने चुनौती नई घोषणा करने की नहीं, नई व्यवस्था को टिकाऊ बनाने की है।
जनता के सामने चुनौती सरकार की आलोचना करने की नहीं, बल्कि यह पूछने की है कि उसके कर से चलने वाली व्यवस्था का परिणाम क्या निकला।
और शिक्षा विभाग के सामने सबसे बड़ा प्रश्न शायद यही है—
“नई नीति कब लागू होगी?” से ज्यादा महत्वपूर्ण है—”नई नीति पांच साल बाद भी कितनी प्रभावी रहेगी?”
क्योंकि स्कूलों में बदलाव एक दिन में नहीं आता।
बदलाव तब आता है, जब नीति बदलने वाले चेहरे बदल जाएं, लेकिन नीति की अच्छी बातें व्यवस्था में बनी रहें।

